DIFFERENCE BETWEEN INDIAN NATIVE A2 COW MILK AND CROSS BREED A1 COW MILK AND HEALTH BENEFITS OF A2 COW MILK

SACRED SANCTITY OF DESI COWS AND HEALTH BENEFITS OF INDIAN NATIVE A2 COW MILK:

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गाय

गाय की पूज्यता का संकेत उपचार शुद्धिकरण और प्रायश्चित के संस्कारों में पंचगव्य, गाय के पांच उत्पादन, दूध दही, मक्खन, मूत्र और गोबर के प्रयोग से मिलता है। उसके उत्पादन पोषण प्रदान करते हैं। गाय को मातृत्व और धरती माँ से भी संबद्ध किया गया। गाय को मारना ब्रह्म हत्या जैसा निंदनीय कार्य माना जाता है । ईसा की पहली शताब्दी के मध्य में गुप्त राजाओं द्वारा गाय की हत्या करने पर मृत्युदंड का प्रावधान किया गया।

धार्मिक मान्यताएँ
भारतीय परंपरा के अनुसार गाय के शरीर में 33 करोड़ देवता वास करते हैं, एवं गौ-सेवा करने से एक साथ 33 करोड देवता प्रसन्न होते हैं। गाय का विशिष्ट संबंध कई देवताओं, विशेषकर शिव जिनका वाहन बैल है। इंद्र मनोकामना पूर्ण करने वाली गाय, कामधेनु से निकट से संबद्ध, कृष्ण अपनी युवावस्था में एक ग्वाले और सामान्य रूप से देवियों के साथ उनमें से कई के मातृवत गुणों के कारण जोड़ा जाता है। Continue reading

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गोमय धूप

सनातन धर्म में अगरबत्ती का प्रयोग वर्जित है। दाह संस्कार में भी बांस नहीं जलाते। फिर बांस से बनी अगरबत्ती जलाकर भगवान को कैसे प्रसन्न कर सकते हैं? शास्त्रों में बांस की लकड़ी जलाना मना है। शास्त्रों में पूजन विधान के समय कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धुप ही लिखा है।

 

(अरासायनिक धूप Organic/ Chemicalfree Dhoop)

– गाय के गोबर का धूआं घर में फैलने से घर के अंदर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, वास्तु दोष शांत होता है। सुबह शाम इसके जलाने से मच्छर भाग जाते हैं।

 

– इसकी भस्म से मंजन करने से दाँतों के कई रोग में लाभ होता है। भस्म को भोजन के पुर्व लेने से भूख खुलती है, एवं भोजन के पश्चात लेने से भोजन जल्दी पच जाता है। एसीडीटी में आराम देता है। फेसपैक की तरह से लगानें से फेसियल जैसी चमक आती है।

 

– जब गोपलक को सूखी गाय से लाभ होगा तो वह उसे कसाई के हाथो नही बेचेगा। इस तरीके से हम गोरक्षा और गौसेवा कर सकते हैं।

 

गोमय धूप के लिए संपर्क करें:-

Swami Manmohan Ramanujdas – 98740 46076

Contact For Dhoop:-

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मानसिक उत्कर्ष के लिये चान्द्रायण व्रत की उपयोगिता

चान्द्रायण व्रत पूर्णिमा से आरम्भ होता है। जितना आहार प्रारम्भ में लिया गया हो उसे क्रमशः घटाते हुए अमावस्या और प्रतिपदा को निराहार रहते हैं। इसके बाद चन्द्रमा की कलाओं की भाँति आहार को क्रमशः बढ़ाते हुए पूर्णिमा तक गत पूर्णिमा जितने आहार तक पहुँच जाते हैं। इस मोटे नियम को सभी जानते हैं। पर साथ ही यह भी जानना चाहिए कि केवल भूखे रहना ही चान्द्रायण व्रत नहीं है। शरीर की भाँति अन्तःकरण का, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का भी उसमें शोधन करना पड़ता है। यदि यह शोधन, कार्य न हो तो इस महाव्रत को तपश्चर्या न कहा जा सकेगा फिर यह लंघन करने का एक साधारण शारीरिक आरोग्य विधान मात्र रह जायगा। ऐसी दशा में पापों का प्रायश्चित और आत्म उत्थान का जो महात्म्य शास्त्रकारों ने वर्णन किया है वह कहाँ पूरा हो सकेगा?

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चान्द्रायण व्रत द्वारा शरीर-शोधन

उच्चस्तरीय साधन में चान्द्रायणव्रत का महत्व विशेष रूप से माना गया है। यों साधारण अनुष्ठानों में भी किसी-न-किसी रूप में उपवास तो करना ही होता है। फल, दूध पर जो लोग नहीं रह सकते, वे शाकाहार से काम चलाते हैं। जो अन्न लेते हैं वे भी अस्वाद व्रत निवाहते है या फिर इतना भी न बन पड़े तो एक समय एक अन्न और एक शाक लेकर आधा उपवास तो कर ही लेते हैं। उपवास भी अनुष्ठान के साथ चलने वाले आवश्यक नियमों में से एक माना गया है। चान्द्रायण व्रत इसका और भी परिष्कृत रूप है। उसमें रहने वाली अन्य अगणित विशेषताओं के कारण ऋषियों ने इस महाव्रत को ‘तप’ कहा है। तपश्चर्या के साथ की गई गायत्री उपासना का विशेष परिणाम होना ही चाहिए। शास्त्रकारों ने वर्तमान युग की स्थिति को देखते हुए अन्य युगों की कठोर तपश्चर्याओं का निषेध करते हुए वर्तमान काल के उपयुक्त तपों में चान्द्रायण को ही सर्वश्रेष्ठ माना है।

 

शरीर-शोधन की दृष्टि से चान्द्रायण व्रत एक बहुत ही प्रखर वैज्ञानिक पद्धति है। प्राकृतिक-चिकित्सा-विज्ञान के प्रमुख सिद्धान्तों का उसमें भली प्रकार समावेश हो गया है। चिकित्सा-पद्धतियों में सबसे निर्दोष और रोगों की जड़ को काट डालने वाली प्राकृतिक-चिकित्सा ही है। उस पद्धति में उपवास और एनीमा यह दो प्रधान आधार हैं। उपवास में पाचन यन्त्रों को विश्राम मिलने से उन्हें पुनः नवजीवन प्राप्त करके तत्परतापूर्वक अपना काम करने की क्षमता उपलब्ध करने का अवसर मिलता है। एनीमा से मलाशय में भरी हुई सड़न और सूखी मल ग्रन्थियों की सफाई करके उदर को निर्मल बनाने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। पेट में भरी हुई अम्लता, सड़न, दूषित वायु एवं विषाक्तता ही शरीर के विभिन्न अंगों में दीख पड़ने वाले, अगणित रोगों की एक मात्र कारण होती है। प्राकृतिक चिकित्सा में पेट की सफाई करके उसे निर्मल बनाने और उपवास द्वारा विश्राम देकर उसे पुनः सशक्त बनाने का जो प्रयत्न किया जाता है उससे निस्संदेह अनेक नये-पुराने रोगों की निवृत्ति में जादू की तरह लाभ होता है। यों कटि-स्नान, मिट्टी की पट्टी सूर्य स्नान, मालिश आदि उपचार भी प्राकृतिक-चिकित्सा में काम आते हैं, पर उन सब का लाभ उपरोक्त दो प्रधान प्रयोगों की तुलना में नाममात्र का ही है। तीन-चौथाई लाभ तो उपवास और एनीमा के दो प्रयोगों में ही हो जाता है। अन्य सब उपचार मिलकर एक-चौथाई लाभ भी मुश्किल से पहुँचा पाते हैं।

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