ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

हिंदू जाति की आज जो दुर्दशा है,वह पराधीन है, दीन है, दुखी है और सभी प्रकार से अवनत है; इसके कारण पर विचार करते समय आजकल कुछ भाई ऐसा मत प्रकट किया करते है की वर्णाश्रम-धर्म के कारण ही हिन्दू जाति की ऐसी दुर्दशा हुई है ।

वर्णाश्रम-धर्म न होता तो हमारी ऐसी स्थिति न होती । परन्तु विचार करने पर मालूम होता है की इस मत को प्रकट करने वाले भाईओ ने वर्णाश्रम-धर्म के तत्व को वस्तुत: समझा ही नहीं है ।

सच्ची बात तो यह है की जब तक इस देश में वर्ण आश्रम-धर्म का सुचारू रूप से पालन होता था । तब तक देश स्वाधीन था तथा यहाँ पर प्राय: सभी  प्रकार की सुख-समृधि थी । जबसे वर्णाश्रम-धर्म के पालन में अवेहलना होने लगी, तभी से हमारी दशा बिगड़ने लगी । इतने पर भी वर्णाश्रम-धर्म की द्रढ़ता ने ही हिन्दू जाति को बचाए रखा है ।

वर्णाश्रम  न होता और उसपर हिन्दू जाति की आस्था न होती तो शताब्दियों में होने वाले आक्रमणों से और विजेताओ के प्रभाव से हिन्दू जाति से अब तक नष्ट हो गयी होती ।

पर-देशीय और पर-धर्मीय लोगो की सभ्यता, भाषा, आचरण, व्यवहार, रहन-सहन और पोशाक-पहनावा आदि के अनुकरण ने वर्णाश्रम-धर्म की शिथिलता में बड़ी सहायता दी है । पहले तो मुसलमानी शासन में हम लोग उनके आचारो की और झुके-किसी अंश में उनके आचार-व्यवहार की नक़ल की, परन्तु उस समय तक हमारी अपने शास्त्रो में, अपने पूर्वजो में, अपने धर्म में, अपने नीति में श्रधा थी, इससे उतनी हानि नहीं हुई, परन्तु वर्तमान पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति आँधी में तो हमारी आंखे सर्वथा बंद सी हो गयी । हम मनो आँखें मूँद कर अंधे हो कर अपनी नक़ल करने लगे है ।

इससे से वर्णाश्रम-धर्म में आज कल बहुत शिथिलता आ गयी है । और यदि यही गति रही तो कुछ समय में वर्णाश्रम-धर्म का बहुत ही हास हो जायेगा । और हमारा ऐसा  करना अपने ही हाथों अपने पैरों में कुल्हाड़ी मरने के समान होगा ।

धर्म और नीति के त्याग से एक बार भ्रमवश चाहे कुछ सुख-सा प्रतीत हो,परन्तु वह सुख की चमक उस बिजली के प्रकाश की चमक के समान है जो गिर कर सब कुछ जला देती है ।

धर्म और नीति का त्याग करने वाला रावण, हिरन्यकस्यपू, कंस और दुर्योधन आदि की भी एक बार कुछ उन्नती-सी दिखायी दी थी, परन्तु अंत में उनका समूल विनाश हो गया ।

दुःख की बात है की पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति के मोह में पढ़ कर आज हिन्दू-जाति के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग दुसरे के आचार-व्यवहार का अनुकरण कर बोलचाल, रहन-सहन और खान-पान में धर्म विरुद्ध आचरण करने लगे है और इसके परिणाम स्वरुप वर्णाश्रम-धर्म को न मानने वाली विधर्मी जातियो में विवाह आदि सम्बंध स्थापित करके वर्ण में संकरता उत्पन्न कर रहे है ।

वर्ण में संकरता आने से जब वर्ण-धर्म,जाति-धर्म नष्ट हो जायेगा तब आश्रम-धर्म तो बचेगा ही कैसे? अतएव सब लोगो को बहुत चेष्टा करके पाश्चात्य आचार-व्यवहारो के अनुकरण से स्वयं बचना और भ्रमवश अनुकरण करने वाले लोगो को बचाना चाहिए ।

हिंदी सनातन धर्म में अत्यंत छोटे से लेकर बहुत बड़े तक सभी कार्यो का धर्म से सम्बंध है । हिन्दू का जीवन धर्ममय है । उसका जन्मना-मरना, खाना-पीना, सोना-जागना, देना-लेना, उपार्जन करना और त्याग करना- सभी कुछ धर्म सगत होना चाहिए ।

धर्म से बाहर उसकी कोई क्रिया नहीं होती । इस धर्म का तत्व ही वर्णाश्रम-धर्म में भरा है । वर्णाश्रम-धर्म हमे बतलाता है की किसके लिए किस समय, कौन- सा कर्म किस प्रकार करना उचित है । और इसी कर्म-कौशल से हिन्दू अपने इहलौकिक जीवन को सुखमय बिता कर अपने सब कर्म भगवान् के अर्पण करता हुआ अंत में मनुष्य-जीवन के परम ध्येय परमात्मा को प्राप्त कर सकता है ।

इस धर्ममय जीवन में चार वर्ण और उन चार वर्णों में धर्म की सुव्यवस्था रखे के लिए सबसे प्रथम ब्राह्मण का अधिकार और कर्तव्य माना गया है । ब्राह्मण धर्म-ग्रंथो की रक्षा, प्रचार और विस्तार  करता है और उसके अनुसार तीनो वर्णों से कर्म कराने के व्यवस्था करता है । इसी से हमारे धर्मग्रंथो का  सम्बंध आज भी ब्राह्मण जाति से है और आज भी ब्राह्मण जाति धर्मग्रंथो के अध्ययन के लिए संस्कृत भाषा पढने में सबसे आगे है ।

यह स्मरण रखना चाहिए की संस्कृत अनादि भाषा है और सर्वांगपूर्ण है । संस्कृत के सामान वस्तुतः सुसंकृत भाषा दुनिया और कोई है ही नहीं । आज जो संस्कृत की अवहेलना है उसका कारण यही है की संस्कृत राजभाषा तो है ही नहीं, उसे राज्य की और से यथा योग्य आश्रय भी प्राप्त नहीं है और तब तक होना बहुत ही कठिन भी है जब तक हिन्दू-सभ्यता के प्रति श्रधा रखने वाले संस्कृत के प्रेमी शासक न हो।

इस लिए जब तक वैसा नहीं होता, कम-से-कम तब तक प्रत्येक धर्म-प्रेमी पुरुष का कर्तव्य होता है की वह सनातन वैदिक वर्णाश्रम-धर्म की रक्षा के हेतु भूत  ब्राह्मणत्व की और परम धर्म रूप संस्कृत ग्रंथो की एवं संस्कृत भाषा की रक्षा करे ।

यह स्मरण रखना चाहिये की ब्राह्मणत्व की रक्षा ब्राह्मण के द्वारा ही होगी । क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र अपने सदाचार,सद्गुण तथा ज्ञान आदि के प्रभाव से भगवन को प्राप्त को कर सकते है; परन्तु वे ब्राह्मण नहीं बन सकते । ब्राह्मण तो वही है जो जन्म से ही ब्राह्मण है और उसी को वेदादि  पढ़ाने का अधिकार है ।

मनु महाराज ने कहा है –

अधियिरनस्त्र्यो वर्णाः स्वकर्मस्था दिविजातय: ।

प्रब्रुयाद ब्राह्मणस्त्वेसाम् नेतराविति निश्चयः ।। (मनु १० । १)

“अपने-अपने कर्मो में लगे हुए (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य-तीनो) द्विजाति वेद पढ़े परन्तु इनमे से वेद पढावे ब्राह्मण ही, क्षत्रिय वैश्य नहीं यह निश्चय है ।”

इससे यह सिद्ध होता है की ब्राह्मण के बिना वेद की शिक्षा और कोई नहीं दे सकता और वेद के बिना वैदिक वर्णाश्रम-धर्म नहीं रह सकता, इसलिए ब्राह्मण की रक्षा अत्यंत आवश्यक है ।
शास्त्रो में ब्राह्मण को सबसे श्रेस्ठ बतलाया है । ब्राह्मण की बतलाई हुई विधि से ही धर्म, अर्थ, कम, मोक्ष चारों की सिद्धी मानी गयी है । ब्राह्मण का महत्व बतलाते हुए शास्त्र कहते है –

ब्राह्मणोस्य मुखमासीद बाहु राजन्य: क्रतः ।

ऊरु तदस्य यद्वैश्य पदाभ्यां शूद्रो अजायत ।। (यजुर्वेद ३१ । ११)

‘श्री भगवान के मुख से ब्राह्मण की, बाहू से क्षत्रिय की, उरु से वैश्य की और चरणों से शुद्र की उत्पति हुई है ।’

‘उत्तम अंग से (अर्थात भगवान के श्री मुख से) उत्पन्न होने तथा सबसे पहले उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से ब्राह्मण इस जगत का धर्म स्वामी होता है । ब्रह्मा ने तप करके हव्य-कव्य पहुचाने के लिए और सम्पूर्ण जगत की रक्षा के लिए अपने मुख से सबसे पहले ब्राह्मण को उत्पन्न किया ।’ (मनु १ । ९३-९४)

‘जाति की श्रेष्ठता से, उत्पत्ति स्थान की श्रेष्ठता से, वेद के पढ़ने-पढ़ाने आदि नियमो को धारण करने से तथा संस्कार की विशेषता से ब्राह्मण सब वर्णों का प्रभु है ।’ (मनु० १० । ३) ।

‘समस्त भूतो में स्थावर (वृक्ष) श्रेस्ठ है । उनसे सर्प आदि कीड़े श्रेस्ठ है । उनसे बोध्युक्त प्राणी श्रेस्ठ है । उनसे मनुष्य और मनुष्यों में प्रथमगण श्रेस्ठ है । प्रथमगण से गन्धर्व और गन्धर्वो से सिद्धगण,सिद्धगण से देवताओ के भर्त्य किन्नर आदि श्रेस्ठ है ।

किन्नरों और असुरो की अपेक्षा इन्द्र आदि देवता श्रेस्ठ है । इन्द्रादि देवताओ से दक्ष आदि ब्रह्मा के पुत्र श्रेस्ठ है । दक्ष आदि की अपेक्षा शंकर श्रेस्ठ है और शंकर ब्रह्मा के अंश है इसलिए शंकर से ब्रह्मा श्रेस्ठ है । ब्रह्मा मुझे अपना परम आराध्य परमेश्वर मानते है ।

इसलिए ब्रह्मा से में श्रेस्ठ हु और मैं दिज देव ब्राह्मण को अपना देवता या पूजनीय समजह्ता हु । इसलिए ब्राह्मण मुझसे भी श्रेस्ठ है । इस कारण ब्राह्मण सर्व पूजनीय है, हे ब्राह्मणों ! में इस जगत में दुसरे किसी की ब्राह्मणों के साथ तुलना भी नहीं करता फिर उससे बढ़ कर तो किसी को मान ही कैसे सकता हु ।

ब्राह्मण क्यों श्रेस्ठ है ?

इसका उत्तर तो यही है की मेरे ब्राह्मण रूप मुख में जो श्रधापूर्वक अर्पण किया जाता है (ब्राह्मण भोजन कराया जाता है) उससे मुझे परम तृप्ति होती है; यहाँ तक की मेरे अग्निरूप मुख में हवन रूप करने से भी मुझे वैसी तृप्ति नहीं होती ।’ (श्री मदभागवत ५ । ५ । २१-२३) ।

उपयुक्त शब्दों से ब्राह्मण के स्वरुप और महत्व का अच्छा परिचय मिलता है ।

इसी प्रकार मनु महाराज ने भी कहा है –

‘स्थावर जीवो में प्राणधारी श्रेस्ठ है, प्राणधारियो में बुद्धिमान: बुद्धिमानों में मनुष्य और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेस्ठ कहे गए है । ब्राह्मणों में विद्वानों, विद्वानों में कृत बुद्धि (अर्थात जिनकी शास्त्रोक्त कर्म में बुद्धि है) कृत बुद्धियो में शास्त्रोक्त कर्म करने वाले और उनमे भी ब्रह्म्वेता ब्राह्मण श्रेस्ठ है । उत्पन्न हुआ ब्राह्मण पृथ्वी पर सबसे श्रेस्ठ है; क्योकि वह सब प्राणियो के धर्म समूह की रक्षा के लिए समर्थ मना गया है । (मनु० १ । ९६,९७,९८)

ब्राह्मणों की निंदा का निषेध करते हुए भीष्म पितामह युधिस्ठिर से कहते है –

‘हे राजन ! जो अज्ञानी मनुष्य ब्राह्मणों की निंदा करते है, में सत्य कहता हूँ की वे नष्ट हो जाते, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।’ (महा अनु० ३३ । १८)

‘ब्राह्मणों की निंदा कभी नहीं सुननी चाहिये । यदि कही ब्राह्मण-निंदा होती हो तो वहा या तो निचा सिर करके  चुप चाप बैठा रहे अथवा वहाँ से उठ कर वहाँ से चला जाए । इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी मनुष्य न जन्मा है और न जन्मेगा ही जो ब्राह्मणों से विरोध करके सुख से जीवन व्यतीत कर सके ।’ (महा अनु० ३३ । २५-२६) ।

इस पर यदि कोई कहे की ब्राह्मणों की जो इतनी महिमा कही जाती है, यह उन ग्रंथो के कारण ही तो है, जो प्राय ब्राह्मणों के बनाये हुए है और जिनमे ब्राह्मणों ने जान बूझ कर अपने स्वार्थ साधन के लिए नाना प्रकार के रास्ते खोल दिए है । तो इसके उत्तर यह है की ऐसा करना वस्तुतः शास्त्र-ग्रंथो से यथार्थ परिचय न होने के कारण ही है । शास्त्रो और प्राचीन ग्रंथो के देखने से यह बात सिद्ध होती है, ब्राह्मण ने तो त्याग ही त्याग किया है । राज्य क्षत्रियो के लिए छोड़ दिया,धन के उत्पत्ति स्थान कृषि,गो रक्षा और वाणिज्य आदि को और धन-भण्डार को विषयो के हाथ दे दिया । शारीरिक श्रम से अर्थोपार्जन करने का कार्य शूद्रों के हिस्से में आ गया है । ब्राह्मणों ने तो अपने लिए रखा अपने लिखे केवल संतोष से भरा त्याग पूर्ण जीवन ।

इसका प्रमाण शास्त्रो के वे शब्द है, जिनमे ब्राह्मण की वृत्ति का वर्णन है –

‘ब्राह्मण ऋत, अमृत, मृत,प्रमृत, या सत्यानृत से अपना जीवन बितावे परन्तु श्रवृति अर्थात सेवावृति- नौकरी न करे । उञ्छ और शील  को ऋत  को जानना चाहिये । बिना मांगे मिला हुआ अमृत है । मांगी हुई भिक्षा मृत कहलाती है और खेती को प्रमृत कहते है । वाणिज्य को सत्यानृत कहते है, उससे भी जीविका चलाई जा सकती है किन्तु सेवाको  श्रवृति   कहते है इसलिए उसका त्याग कर देना चाहिये ।’ (मनु० ४ । ४-६ ) ।

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