खंडित होता भारत

खंडित होता भारत

वे कहते है, भूल जाऊं मैं, सिन्धु की शीतल लहरे,
वे कहते है, भूल जाओ, सातो दरिया गहरे गहरे,
वे कहते है भूल जाऊं मैं, पौरष की गौरव गाथा,
वे कहते है भूल जाऊं, कैलाश, हिमाचल का माथा,
वे कहते है भूल जाऊं मैं, मानसरोवर की उर्मी,
वे कहते है, भूल जाऊं मैं देश बंगाले की भूमि,
वे कहते है हिन्दूकुश का नाम भूलना ही होगा।
वे कहते है तक्षशिला का ज्ञान भूलना ही होगा,
वे कहते है मुरलीधर घनश्याम भूलना ही होगा,
वे कहते है अब तो तुमको राम भूलना ही होगा,
वे कहते है परशुराम बलराम भूलने ही होंगे,
वे कहते है कौन्तेय के बाण भूलने ही होंगे.
वे कहते है महाभारत संग्राम भूलना ही होगा,
यह भी कह दो मुझको हिंदुस्तान
भूलना ही होगा।

 

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वे कहते है भूल जाऊं मै दाहिर की संघर्ष कथा,
वे कहते है भूल जाऊं मैं काबुल जाबुल की प्रथा,
वे कहते है भूल जाऊं मैं वीर शिवाजी की बातें
वे कहते है भूल जाऊं मैं चंचल चेतक की टापे,
वे कहते है भूल जाऊं मैं राणा का भारी भाला,
हल्दी घाटी में भारत जब पीता था रण
का प्याला।
जब मुट्ठी भर राजपूत मुगलों का मर्दन करते थे,
मातृभूमि की बलि वेदी पर तन मन अर्पण करते
थे।
वे कहते है भूल जाऊं मैं पृथ्वी राज के तीरों को,
वे कहते है भूल जाऊं गजनी में लड़ते वीरो को।
कैसे भूल जाऊं, केशव की रण में गूँज रही गीता,
वे कहते है भूल जाऊं मैं लंका में तपती सीता।
वे कहते है भूल जाऊं मैं रामायण की सब बाते,
न देखू रामेश्वरम सेतु से लहरे टकराते।
युगों युगों से भारत के जन जन के मन में बसे हुए,
रोम रोम में, कण कण में, हर भाव लहर में रचे हुए,
कितने कितने जन्मो से जो अंतर्मन में जड़े हुए,
स्वर अक्षर में, सुख दुःख में, जो स्वांस स्वांस में रमे
हुए।
वे कहते है तुम्हे वेद व् श्रुति को तजना होगा,
वे कहते है मुझे पराये पुरखो को भजना होगा,
विश्वामित्र वशिष्ठ दधिची, ये सब मिथ्या झूठे
है,
वे कहते है मुझे एक नव वंश वृक्ष रचना होगा।
वे कहते है वीर विक्रमादित्य कभी न आये थे,
वे कहते है किसी यवन ने मागध वीर हराए थे,
कहाँ गया वह वीर यूनानी, नाम
नहीं इतिहासों में,
वे कहते है तुमने ऐसे सब इतिहास मिटाए थे।
वे कहते है नहीं अवध में रामचंद्र जी आये थे,
वे कहते है काशी में शिव डमरू नहीं बजाये थे,
वे कहते है गोवर्धन मथुरा वृन्दावन झूठे है,
तो कोई बतलाये ये स्थान कहाँ से आये थे।
वे कहते है मेरे पुरखे कहीं दूर से आये थे,
हाँ मै भी कहता हूँ वे चल कहीं दूर से आये थे,
वैदिक ज्योति जलाकर जाकर जीना जग
को सिखलाया,
नील नदी के तट से बाली के टापू तक छाये थे।
वे लोट वहां से आये थे।
वे कहते है भूल जाऊं मैं नानक की पुण्य भूमि,
वे कहते है भूल जाऊं यज्ञशाला से उठती धूमी,
वे कहते है भरत भूमि की सब गाथा दफना डालू,
वे कहते है तेग बहादुर की हत्या बिसरा डालू.
वे कहते है भूल जाऊं मै तुर्कों के सब वारो को,
वे कहते है भूल जाऊं मै अरबी अत्याचारों को,
वे कहते है भूल जाऊं जो जीवित संत जलाये थे
वीर पराक्रमी बालक दीवारों में चिन्वाए थे।
वे कहते है याद रखु मै औरंगजेब दयालु को
वे कहते है याद रखूं मैं खिलजी से कृपालु को
वे कहते हैं कभी किसी ने नहीं जनेऊ काटे थे
वे कहते है कभी किसी ने संत मार न टांके थे।
वे कहते है स्रोत दया की यह पिसाची छाया थी,
कोप क्रोध अल्लाह का तो बस त्व
कल्पना माया थी,
प्रेम करुणा ज्ञान दया का उत्स अरब से था आया,
प्रेम करुणा ज्ञान दया वश अरब छीलते थे काया।
प्रेम करुणा ज्ञान दया वश जिन्दा बालक
दफनाये ,
प्रेम करुणा ज्ञान दया वश नगर हजारो जलवाए,
तक्ष शिला के ज्ञान सदन छः छः महीनो तक
सुलगाये,
नरमुंडो के पर्वत पर चढ़ दीनी प्रभु हर्षाये।
वे कहते है भूल जाऊं जो ज्ञान कोष जलवाए थे,
बुझे नहीं जो प्रलय तक भी, भाव विकट धधकाए
थे,
क्योंकर काल बिसारेगा कुछ, खेल अभी तक
जारी है,
कहाँ अभी तक आर्यों के पुत्रो ने खेली पारी है।
काल चक्र के कुछ विकराल घुमावो की यह
माया है,
युगों युगों से सोये भरत को होश नहीं जो आया है,
हा! तुमने केशव के सत्य वचनों को ठुकराया है,
नष्ट हुए जब त्याग सुदर्शन,
मुरली को अपनाया है।
नष्ट हुए जब भूल विदुर को, विष्णु गुप्त
भुलाया है,
हार अहिंसा का तुमने इन सर्पो को पहनाया है,
हा! कैसा दुर्भाग्य आज भारत भूमि पर छाया है,
असुर सैन्य इस देव धरा के मस्तक तक चढ़ आया।
वे कहते है, भूल जाऊ मै बाण भट्ट के गीतों कों
वे कहते है भूल जाऊ मै भूषन के प्रतीकों कों
वे कहते है चंदर बरदाई तो एक कल्पना है,
वे कहते है भूल जाऊ मै सब वैदिक प्रगीतो कों
वे कहते है भूल जाऊ मै गंगा जमुना का पानी
वे कहते भूल जाऊ मै छत्रसाल सा सेनानी
वे कहते है भूल जाऊ मै लक्ष्मीबाई के धावे
वे कहते है भूल जाऊ मै वीर मराठो के छावे
वे कहते है मुझको अब चाणक्य भूलना ही होगा
वेद श्रुति व् उपनिषद का वाक्य भूलना ही होगा
वे कहते है वानप्रस्थ की बात भूलनी ही होगी
वे कहते है महारास की रत भूलनी ही होगी
कैसे भूले महारास हम, जग सारा चक्कर खाता
ग्रह उपग्रह संग महासूर्य प्रकम्मा करता जाता
वे कहते है कलयुग, सतयुग, त्रेतायुग सब मिथ्या है
कालचक्र की गणना ज्योतिष पुराकथा सब
मिथ्या है
वे कहते है, नहीं भगीरथ गंगा नभ से लाये थे
वे कहते है विश्वनाथ ने त्रिपुर नहीं गिराए थे
कहते है न परशुराम ने दानव मर मिटाए थे
ना सोने की जीती लंका राम त्याग घर आये थे
माना मैंने किसी कवि के मन मंदिर की रचना है
पर यह सच है कविता का आधार नहीं कोई
सपना है
राम नहीं आये होते तो क्योंकर काव्य बना होता
कैसे बाल्मीकि, तुलसी ने अदभुत रूप रचा होता
वे कहते है दुर्ग भवन सब यवनों ने गढ़वाये थे
तब क्या दिल्लीश्वर कुटिया में फूस की रहते आये
थे
विश्व विजयी सेनाओ का क्या सदन
झोपडी बनती थी।
क्या वे पर्णकुटी की खातिर जौहर करते आये थे ?
श्वान रखैलो की यादो में ताजमहल बन जाते थे
लालकोट पर रात रात में लालकिले तन जाते थे
वे कहते है भूल जाऊ मै इन्द्रप्रस्थ का सभा भवन
इतिहासों में भारत के चारण सपने बुन जाते थे
किन्तु ये मिथ्या प्रलापी मूढमति यह भूल गए
राजपूताने रेतीले के दुर्ग हठीले भूल गए
अगर मरुस्थल में भारत ऐसी रचना रच जाता था
करो कल्पना हृदय स्थल पर क्या क्या गढ़
जाता था?
वे कहते है भूल जाऊ मै गुर्जरेश्वर का गौरव
वे कहते है भूल जाऊ मै सोमनाथ का हत वैभव
वे कहते है गुर्जराष्ट्र की आन भूलनी ही होगी
वे कहते है कृष्णधाम की शान भूलनी ही होगी
कहते है गांधारी का गंधार भूलना ही होगा
हिंगलाज की देवी का स्थान भूलना ही होगा
कैसे भूल जाऊ मै सिन्धु, रावी वहीँ, चिनाब वहीँ
कैसे भूल जाऊ मै झेलम, गढ़ गजनी, गंधार वहीँ
हिंगलाज की अधिष्ठात्री का है प्रतिष्ठान
वहीँ
ढाकेश्वरी भी बसी वहीँ, कटासराज विधमान
वहीँ
वे कहते है यादव कुल गणराज्य भूलने ही होंगे
समुन्द्रगुप्त स्कंध्गुप्त सम्राट भूलने ही होंगे
धीर वीर व् शूरवीर सौमित्र भूलने ही होंगे
तक्षशिला के ज्ञानवीर कौटिल्य भूलने ही होंगे
भूल गए तुम नाम अरब का भारत से ही आया है
इरान, इराकम नामकरण भारत ने ही करवाया है
कालचक्र की माया है वरना इस्लाम नहीं होता
प्रतिहारो के हाथो मक्का वीरान हुआ होता
भूल गए तुम अंक और अक्षर हमने सिखलाये थे
कालचक्र की गणना, पथ नक्षत्रो के समझाए थे
पढ़ लो अरबी इतिहास तुम्हे बस हिन्दू ही मिल
पाएंगे
देश सीरिया में शासक बनिपाल असुर मिल जायेंगे
जग में व्यापक अंकगणित कों अरब हिन्दसा कहते
है।
अपने सर्वाधिक प्रियो कों वे अब तक “हिंदी”
कहते है।

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Categories: Holistic Healing | 1 Comment

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One thought on “खंडित होता भारत

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