सर्वसमर्थ की असामर्थ्यलीला

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श्रीमहाप्रभूजी आज्ञा करते हैं- ‘प्रभू सर्वसमर्थो हि ततो निश्चिंताम् ब्रजेत’।सर्वसमर्थ माने जो सबकुछ करने में समर्थ हो।सब कुछ में ‘असमर्थता’ भी शामिल है।ऐसा तो है नहीं कि असमर्थता को छोड़कर बाकी सब बातों में सर्व समर्थ है, फिर तो सर्वसमर्थता ही खंडित हो जायेगी। प्रभू, परन्तु, अपने सर्व सामर्थ्यवान होनेके धर्म की रक्षा करते हैं।

“ताही अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पे नाच नचावे”

“एक कहे नाचो मेरे आगे ले दऊं और नई”(सर्वज्ञ, सर्वसमर्थ को

पताही नहीं चल रहा है कि ‘मेरी कामर किसने ली,

कहाँ चली गई ?)

यह लीला भगवान ने भक्तों के बीच में प्रकट करी है अतः इसे भगवानकी ‘असामर्थ्यलीला’कहा जा सकता है।

महाप्रभूजी बहुत सुन्दर आज्ञा करते हैं-“सूर सबन की यह गति जे हरि चरण भजे” इस पंक्ति को पूज्य जै जै ने इस तरह समझाया है कि भगवान सारस्वतकल्प में ही भक्तों के वश हुए हों ऐसी बात नहीं है, महाप्रभूजी यह कहना चाह रहे हैं कि आजभी तुम्हारे घरमें भी वह लीला प्रकट हो सकती है,यदि तुम कृष्ण भजन उस तरह से करो जिस तरह से ब्रजभक्तों ने किया।

महाप्रभूजी की इस कृपा के दर्शन इन शब्दों में होते हैं “अब तुम घर में सेवा करो” कहके आप सेवकके माथे सेव्य को पधरा देते थे।यह प्रक्रिया महाप्रभूजी की सर्वसमर्थ को असमर्थ बनाने की है, माने ठाकुरजी को भी इशारा है, “मेरो सेवक जगावे तब जागियो, खवावे तब खाइयो और पोढावे तब पोढियो”

इधर प्रभूकी यह लाचारी है कि वह एक से दो ही,रमणके लिए हुआ है, क्रीड़ा के लिए हुआ है,”स एकाकी न रमते स द्वितीयमेच्छत”

अब यह क्रीड़ा चाहे स्नेह की हो या द्वेशकी,सख्यकी हो चाहे दास्यकी, हारकी हो चाहे जीतकी, उसे हर हालमें क्रीड़ा चालू रखनी है- “सूरदास प्रभू खेल्यो ही चाहत दियो दाव कर नन्द दुहंया”।

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Categories: Holistic Healing | Leave a comment

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