सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छात:करिष्यति

प्रभु की सेवा करते समय किसी समय भगवान चित्त में उद्वेग कराकर जो जो करेंगें उनकी वैसी ही लीला अर्थात खेल मानकर बहुत शीघ्र चिंता का त्याग करें।”-श्रीनवरत्नस्तोत्रम्।

महाप्रभुजी ने बडी तथ्यात्मक बात कही है। हमें जो उद्वेग होता है इसका मूल कारण प्रभु स्वयं हैं। ‘नाना भाव मुझी से होते हैं’ – ऐसा स्वयं प्रभु ने कहा है। हम समझते हैं उद्वेग किसी व्यक्ति घटना परिस्थिति के कारण होता है तब हम राग द्वेष के शिकार हो जाते हैं। किसी से नफरत हो जाती है तो किसी से डर, भय, शंका इत्यादि। समझना यह है कि उद्वेग का कारण प्रभु स्वयं हैं। ऐसा क्यों? तो वल्लभ कहते हैं – ये उनकी लीला है।

‘ऐसी लीला क्यों?’ इसका कोई उत्तर नहीं है। यह अनिर्वचनीय है। हरि करे सो स्वीकारो। निजेच्छात:करिष्यति। वे जो करेंगे उनकी मर्जी से करेंगे। दास का काम है-स्वीकारना। अस्वीकार का अर्थ है-अहंकार। और अहंकार के अस्वीकार करने से कुछ नहीं होता। अंत में होता वही है जो प्रभु को मंजूर होता है। अगर हम अपने उद्वेग का विरोध करें तो भी क्या होगा, तकलीफ बढ जायेगी। और यदि स्वीकार लें उद्वेग को हृदय से कि अपने प्रिय प्रभु ही तो यह लीला कर रहे हैं, तो शांति हो जायेगी। कोई महंगी वस्तु अपने प्रियजन से टूट फूट जाय तो हमें उद्वेग हो जाता है लेकिन क्या करें जिससे फूटी वह हमारा ही प्रियजन है। तो उद्वेग भी सहन और स्वीकार हो जाता है हमें। यही कार्य किसी विरोधी के हाथ से हो जाय तो हमें न सहन होता है, न स्वीकार। महाप्रभु कहते हैं-सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छात:करिष्यति।

सबके नियामक सबके ईश्वर निजेच्छा से ही करेंगे सब कुछ। लेकिन वह ‘सब कुछ’ कोई अप्रिय गंभीर बात नहीं है अपितु क्रीडा मात्र है। इसे समझना कठिन है फिर भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। प्रभु क्रीडा कर रहे हैं-यह सच है? वल्लभ वाणी तो यही कहती है। तो इसे समझने के लिये वल्लभ के विरोध में न जाकर वल्लभ के अनुकूल होना होगा और तब इस क्रीड़ा के, खेल के रहस्य को समझना होगा। क्या प्रभु लौकिक और अलौकिक दो प्रकार की लीला करते हैं? प्रभु की ही लीला है तो वह लौकिक कैसे हो सकती है? देखा जाय तो सब अलौकिक है, सिर्फ प्रकार भेद है आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक। यह जो हरि गुरु वैष्णव के संबंध में लीला है वह आधिदैविक है। यह जो वैष्णव को आधिभौतिक और आध्यात्मिक प्रकार मालूम होता है आसुरी, प्रवाही और मर्यादी जीवों के कारण इससे घबराना नहीं चाहिए अपितु इसमें प्रभु की कोई लीला देखकर निश्चिंत हो जाना चाहिए। कभी यह संदेह नहीं रखना चाहिए कि कोई सत्ता प्रभु से बडी और हानिकारक हो सकती है। कभी नहीं। महाप्रभुजी इसकी पुष्टि करते हैं –
एवं सदा स्मकर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति।
प्रभु:सर्वसमर्थो हि ततो निश्चिंत तां व्रजेत्।।
बस जीव को भरोसा हो जाय कि सचमुच प्रभु के ही हाथ में है सबकी बागडोर। फिर तो किसी हालत में चिंता नहीं हो सकती चाहने पर भी।
ईश्वर:सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारुढानि मायया।।

उसकी शरण स्वीकार लो फिर सब ठीक है। महाप्रभुजी कहते हैं – कभी कभी नहीं हर वक्त हर क्षण उसकी शरण में रहो। बोलते ही रहो “श्रीकृष्ण:शरणं मम”। कुछ और बोलने की फुर्सत भी नहीं होनी चाहिए। तब कोई कष्ट कैसे होगा! न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। 🌹🍁🌷🌹💐🌷

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Categories: Holistic Healing, Meditation, Religious | Leave a comment

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