Education & Training

DIFFERENCE BETWEEN INDIAN NATIVE A2 COW MILK AND CROSS BREED A1 COW MILK AND HEALTH BENEFITS OF A2 COW MILK

SACRED SANCTITY OF DESI COWS AND HEALTH BENEFITS OF INDIAN NATIVE A2 COW MILK:

Continue reading

Advertisements
Categories: Education & Training, Food & Diet, Holistic Healing, Nature Cure | Leave a comment

मानसिक उत्कर्ष के लिये चान्द्रायण व्रत की उपयोगिता

चान्द्रायण व्रत पूर्णिमा से आरम्भ होता है। जितना आहार प्रारम्भ में लिया गया हो उसे क्रमशः घटाते हुए अमावस्या और प्रतिपदा को निराहार रहते हैं। इसके बाद चन्द्रमा की कलाओं की भाँति आहार को क्रमशः बढ़ाते हुए पूर्णिमा तक गत पूर्णिमा जितने आहार तक पहुँच जाते हैं। इस मोटे नियम को सभी जानते हैं। पर साथ ही यह भी जानना चाहिए कि केवल भूखे रहना ही चान्द्रायण व्रत नहीं है। शरीर की भाँति अन्तःकरण का, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का भी उसमें शोधन करना पड़ता है। यदि यह शोधन, कार्य न हो तो इस महाव्रत को तपश्चर्या न कहा जा सकेगा फिर यह लंघन करने का एक साधारण शारीरिक आरोग्य विधान मात्र रह जायगा। ऐसी दशा में पापों का प्रायश्चित और आत्म उत्थान का जो महात्म्य शास्त्रकारों ने वर्णन किया है वह कहाँ पूरा हो सकेगा?

Continue reading

Categories: Education & Training, Holistic Healing, Life Style, Nature Cure, Religious | Leave a comment

चान्द्रायण व्रत द्वारा शरीर-शोधन

उच्चस्तरीय साधन में चान्द्रायणव्रत का महत्व विशेष रूप से माना गया है। यों साधारण अनुष्ठानों में भी किसी-न-किसी रूप में उपवास तो करना ही होता है। फल, दूध पर जो लोग नहीं रह सकते, वे शाकाहार से काम चलाते हैं। जो अन्न लेते हैं वे भी अस्वाद व्रत निवाहते है या फिर इतना भी न बन पड़े तो एक समय एक अन्न और एक शाक लेकर आधा उपवास तो कर ही लेते हैं। उपवास भी अनुष्ठान के साथ चलने वाले आवश्यक नियमों में से एक माना गया है। चान्द्रायण व्रत इसका और भी परिष्कृत रूप है। उसमें रहने वाली अन्य अगणित विशेषताओं के कारण ऋषियों ने इस महाव्रत को ‘तप’ कहा है। तपश्चर्या के साथ की गई गायत्री उपासना का विशेष परिणाम होना ही चाहिए। शास्त्रकारों ने वर्तमान युग की स्थिति को देखते हुए अन्य युगों की कठोर तपश्चर्याओं का निषेध करते हुए वर्तमान काल के उपयुक्त तपों में चान्द्रायण को ही सर्वश्रेष्ठ माना है।

 

शरीर-शोधन की दृष्टि से चान्द्रायण व्रत एक बहुत ही प्रखर वैज्ञानिक पद्धति है। प्राकृतिक-चिकित्सा-विज्ञान के प्रमुख सिद्धान्तों का उसमें भली प्रकार समावेश हो गया है। चिकित्सा-पद्धतियों में सबसे निर्दोष और रोगों की जड़ को काट डालने वाली प्राकृतिक-चिकित्सा ही है। उस पद्धति में उपवास और एनीमा यह दो प्रधान आधार हैं। उपवास में पाचन यन्त्रों को विश्राम मिलने से उन्हें पुनः नवजीवन प्राप्त करके तत्परतापूर्वक अपना काम करने की क्षमता उपलब्ध करने का अवसर मिलता है। एनीमा से मलाशय में भरी हुई सड़न और सूखी मल ग्रन्थियों की सफाई करके उदर को निर्मल बनाने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। पेट में भरी हुई अम्लता, सड़न, दूषित वायु एवं विषाक्तता ही शरीर के विभिन्न अंगों में दीख पड़ने वाले, अगणित रोगों की एक मात्र कारण होती है। प्राकृतिक चिकित्सा में पेट की सफाई करके उसे निर्मल बनाने और उपवास द्वारा विश्राम देकर उसे पुनः सशक्त बनाने का जो प्रयत्न किया जाता है उससे निस्संदेह अनेक नये-पुराने रोगों की निवृत्ति में जादू की तरह लाभ होता है। यों कटि-स्नान, मिट्टी की पट्टी सूर्य स्नान, मालिश आदि उपचार भी प्राकृतिक-चिकित्सा में काम आते हैं, पर उन सब का लाभ उपरोक्त दो प्रधान प्रयोगों की तुलना में नाममात्र का ही है। तीन-चौथाई लाभ तो उपवास और एनीमा के दो प्रयोगों में ही हो जाता है। अन्य सब उपचार मिलकर एक-चौथाई लाभ भी मुश्किल से पहुँचा पाते हैं।

Continue reading

Categories: Education & Training, Holistic Healing, Life Style, Nature Cure, Religious | Leave a comment

चान्द्रायण व्रत

चान्द्रायण एक प्राचीन भारतीय तप, व्रत अथवा अनुष्ठान है। पाणिनि ने इस तप का निर्देश किया है (अष्टाध्यायी ५/१/७२)। धर्मसूत्रादि में इसकी प्रशंसा में कहा गया है कि यह सभी पापों के नाश में समर्थ है। जब किसी पाप का कोई प्रायश्चित नहीं मिलता, तब चांद्रायण व्रत ही वहाँ अनुष्ठेय है (करना चाहिये)।

 

चान्द्रायण व्रत क्या है

जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चान्द्रायण व्रत कहते है।

 

इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है। इस व्रत में व्यक्ति अपनें खानें को 15 हिस्सों में विभाजित करतें है। प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है। अगले दिन से भोजन का 15वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।

Continue reading

Categories: Education & Training, Holistic Healing, Life Style, Nature Cure, Religious | Leave a comment

अगरबत्ती और प्रदूषण

सनातन धर्म में अगरबत्ती का प्रयोग वर्जित है। दाह संस्कार में भी बांस नहीं जलाते। फिर बांस से बनी अगरबत्ती जलाकर भगवान को कैसे प्रसन्न कर सकते हैं? शास्त्रों में बांस की लकड़ी जलाना मना है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रों में पूजन विधान के समय कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धुप ही लिखा है। अगरबत्ती रसायन पदार्थों से बनाई जाती है, भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुश कैसे होंगे? पुराने लोग कहते आएं हैं कि ‘बांस को जलाने से वंश जलता है।’ धूप सकारात्मकता से युक्त होती है, ऊर्जा का सृजन करती है, जिससे स्थान पवित्र हो जाता है व मन को शांति मिलती है। इनसे नकारात्मक ऊर्जा से युक्त वायु शुद्ध हो जाती है इसलिए प्रतिदिन धूप जलाना अति उत्तम और बहुत ही शुभ है।

Continue reading

Categories: Education & Training, Holistic Healing, Life Style, Nature Cure, Religious | Leave a comment

Create a free website or blog at WordPress.com.

%d bloggers like this: