मुक्त हो गगन सदा

मुक्त हो गगन सदा स्वर्ग सी बने मही।
संघ साधना यही राष्ट्र अर्चना यही॥

व्यक्ती व्यक्ती को जुटा दिव्य सम्पदा बढा
देशभक्ती ज्वार ला लोकशक्ति आ रही।
है स्वतंत्रता यही पूर्ण क्रान्ति है सही ॥ संघ साधना ॥१॥

भरत भूमि हिन्दु भू धर्म भूमि मोक्ष भू
अर्थ-काम सिद्घि भू विश्व में प्रथम रही
संगठित प्रयत्न से हो पुनः प्रथम वही ॥ संघ साधना ॥२॥

जाति मत उपासना प्रांत देश बोलियाँ
विविधता में एकता-राष्ट्र-मालिका बनी।
सैकड़ों सलिलि मिला गंग-धार ज्यों बही॥ संघ साधना ॥३॥

दीनता अभाव का स्वार्थ के स्वभाव का
क्षुद्र भेद भाव का लेश भी रहे नहीं।
मित्र विश्व हो सभी द्वेष-क्लेश हो नहीं॥ संघ साधना ॥४॥

नगर ग्राम बढ़ चलें प्रगति पंथ चढ़ चलें
सब समाज साथ लें कार्य-लक्ष्य एक ही।
माँ बुला रही हमें आरती बुला रही ॥ संघ साधना ॥५॥

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