છીતસ્વામીના પદ

प्रिय नवनीत पालनें झूलें श्री विठ्ठलनाथ झुलावैं हो ।
कबहुँक अाप संग मिल झूलैं कबहुँक उतरि झुलावैं हो ।।१।।

कबहुँक सुरंग खिलौना लै लै नाना भाँति खिलावैं ।
चकरी बंकी फिरकनी लहेंटू झुन झुन हाथ बजावैं ।।२।।

भोजन करत थार एक झारी दोऊ मिलि खाय खवावैं ।
गुप्त महा रस प्रकट जनावें प्रीहि नई उपजावें ।।३।।

धनि धनि भाग्य दास निज जनके जो यह दर्शन पावैं ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्रीविठ्ठल निगम एक करि गावें ।।४।।

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आगे गाय पाछें गाय इत गाय उत गाय,
गोविंद को गायन में बसबोइ भावे।
गायन के संग धावें, गायन में सचु पावें,
गायन की खुर रज अंग लपटावे॥
गायन सो ब्रज छायो, बैकुंठ बिसरायो,
गायन के हेत गिरि कर ले उठावे।
‘छीतस्वामी’ गिरिधारी, विट्ठलेश वपुधारी,
ग्वारिया को भेष धरें गायन में आवे॥

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