કબીરદાસના પદ

અવસર બાર બાર નહિં આવૈ…
જો ચાહો કરિ લેવ ભલાઈ, જનમ જનમ સુખ પાવૈ… અવસર

તન મન ધન મેં નહિં કછુ અપના, છાંડી પલક મેં જાવૈ
તન છૂટે ધન કૌન કામ કે, કૃપિન કાહે કો કહાવૈ… અવસર

સુમિરન ભજન કરો સાહબ કો, જાસે જીવ સુખ પાવૈ,
કહત કબીર પગ ધરે પંથ પર, યમ કે ગણ ન સતાવૈ… અવસર.

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इस तन मन की कौन बड़ाई, देखत नयन में मिटटी मिलाई ।
हाड़ जले जैसे लकड़ी की मूली, काल जले जैसे घास की पूली ॥
अपने खातिर महल बनाया, खुद ही जाकर जंगल में सोया ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, आप मुए फिर डूब गई दुनिया ॥

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जनम तेरा बातों ही बीत गयो, रे तुने कबहू ना कृष्ण कहो |
पाँच बरस को भोलो बालो, अब तो बीस भयो |
मकर पचीसी माया के कारन, देश विदेश गयो ||
तीस बरस की अब मति उपजी, लोभ बढ़े नित नयो |
माया जोड़ी लाख करोड़ी, अजहू न तृप्त भयो ||
वृद्ध भयो तब आलस उपज्यो, कफ नित कंठ नयो |
साधू संगति कबहू न किन्ही, बिरथा जनम गयो ||
यो जग सब मतलब को लोभी, झूठो ठाठ ठयो |
कहत कबीर समझ मन मूरख, तूं क्यूँ भूल गयो ||
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