કુંભનદાસના પદ

भक्तन को कहाँ सिकरी सो काम ।
आवत जावत पनैया टूटी, बिसर गयो हरि नाम ॥
जाको मुख देख दुःख उपजत, ताको करनो परयो प्रनाम ।
कुम्भनदास लाल गिरधर के बिन, वह सब जूठो धाम ॥

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माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ।
मेरे तो ब्रत यहै निरंतर, और न रुचि उपजाऊँ ॥
खेलन ऑंगन आउ लाडिले, नेकहु दरसन पाऊँ।
‘कुंभनदास हिलग के कारन, लालचि मन ललचाऊँ ॥

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