पंचोपचार पूजन

पवित्रीकरणम्

देव उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य को स्वयं भी देवत्व धारण करना होता है ।। देव शक्तियाँ पवित्रता प्रिय हैं ।। उन्हें शरीर और मन से, आचरण और व्यवहार से शुद्ध मनुष्य प्रिय हैं ।। इसलिए यज्ञ जैसे देव प्रयोजन में संलग्न होते समय शरीर और मन को पवित्र बनाना पड़ता है ।। पवित्रता की भावना करनी पड़ती है ।। भावना करें कि हमारे भाव भरे आवाहन के नाते सूक्ष्म सत्ता हम पर पवित्रता की वृष्टि कर रही है ।। हम उसे धारण कर रहे हैं ।।
बायें हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लिया जाए ।। मन्त्रोच्चारण के बाद उस जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लिया जाए ।।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं, स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु ।। -वा०पु० ३३.६

आचमनम्

वाणी, मन और अन्तःकरण की शुद्धि के लिए तीन बार आचमन किया जाता है, मन्त्रपूरित जल से तीनों को भाव स्नान कराया जाता है ।। आयोजन के अवसर पर तथा भविष्य में तीनों को अधिकाधिक समर्थ, प्रामाणिक बनाने का संकल्प किया जाता है ।। हर मन्त्र के साथ एक आचमन किया जाए ।।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥२॥
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि, श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥

शिखावन्दनम्

शिखा भारतीय धर्म की ध्वजा है, जो मस्तक रूपी किले के ऊपर हर भारतीय संस्कृति प्रेमी को फहराते रहनी चाहिये ।। इसे गायत्री का प्रतीक भी माना गया है ।। मस्तिष्क सद्विचारों का केन्द्र है ।। इसमें देव भाव ही प्रवेश करने पाएँ ।। भावना करें कि सांस्कृतिक ध्वजा को धारण करने योग्य प्रखरता, तेजस्विता का विकास हो रहा है ।।
दाहिने हाथ की अँगुलियों को गीला कर शिखा स्थान का स्पर्श करें ।। मन्त्र बोलने के बाद शिखा में गाँठ लगाएँ ।। जिनके संयोगवश शिखा नहीं है, ऐसे व्यक्ति तथा महिलाएँ उस स्थान को भावनापूर्वक स्पर्श करें ।।

ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥ -सं.प्र.

प्राणायामः

कमर सीधी, बायाँ हाथ मुड़ा हुआ, हथेली चौड़ी, दाहिने हाथ की कोहिनी बायें हाथ की हथेली पर बीचो−बीच, चारों अँगुलियाँ बन्द ।।
अँगूठे से दाहिने नथुने को बन्द करके, बायें नथुने से धीरे- धीरे पूरी साँस खींचना- यह पूरक हुआ ।।
साँस को भीतर रोकना, दायें हाथ की तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से बायाँ नथुना भी बन्द कर लेना, अर्थात् दोनों नथुने बन्द ।। यह अन्तः कुम्भक हुआ ।।
अँगूठा हटाकर दाहिना नथुना खोल देना, उसमें से साँस को धीरे- धीरे बाहर निकलने देना, यह रेचक हुआ ।।
इसके बाद कुछ समय साँस बाहर रोक देना चाहिए ।। बिना साँस के रहना चाहिए, इसे बाह्यकुम्भक कहते हैं ।।
इन चार क्रियाओं को करने में एक प्राणायाम पूरा होता है ।। यह क्रिया कठिन लगे, तो दोनों हाथ गोद में रखते हुए दोनों नथुनों से श्वास लेते हुए पूरक, कुम्भक, रेचक का क्रम नीचे लिखी भावनानुसार पूरा करें ।।

न्यासः

बायें हाथ की हथेली पर जल लेना, दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों को इकट्ठा करना, उन एकत्रित अँगुलियों को हथेली वाले जल में डुबोना ।। अब जहाँ- जहाँ मन्त्रोच्चार के संकेत हों, वहाँ पहले बायीं ओर फिर दाहिनी ओर के क्रम से स्पर्श करते हुए हर बार में एकत्रित अँगुलियाँ डुबोते और लगाते चलना, यह न्यास कर्म है ।।
इसका प्रयोजन है- शरीर के अति महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता की भावना भरना, उनकी दिव्य चेतना को जाग्रत् करना ।। अनुष्ठान काल में उनके जाग्रत् देवत्व से सारे कृत्य पूरे करना तथा इसके अनन्तर ही इन अवयवों को, इन्द्रियों को सशक्त एवं संयत बनाये रहना ।।
भावना करें कि इन्द्रियों -अंगों में मन्त्र शक्ति के प्रभाव से दिव्य प्रवृत्तियों की स्थापना हो रही है ।। ईश्वरीय चेतना हमारे आवाहन पर वहाँ विराजित होकर अशुभ का प्रवेश रोकेगी, शुभ को क्रियान्वित करने की प्रखरता बढ़ायेगी ।।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु ।। (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु ।। (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ।। (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ।। (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु ।। (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोर्मे ओजोऽस्तु ।। (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु ।। (समस्त शरीर पर)
-पा. गृ. सू. १.३.२५

मंगलाचरणम्

यज्ञ कर्म अथवा अन्य धर्मानुष्ठानों को सम्पन्न करने वाले याजकों के आसन पर बैठते समय उनके कल्याण, उत्साह, अभिवर्धन, सुरक्षा और प्रशंसा के लिए पीले अक्षत अथवा पुष्प वर्षा की जाती है, स्वागत किया जाता है ।। मन्त्र के साथ भावना की जाए कि इस पुण्य कर्म में भाग लेने वालों पर देव अनुग्रह बरस रहा है और देवत्व के धारण तथा निर्वाह की क्षमता का विकास हो रहा है ।। आचार्य निम्न मन्त्र से यजमान के ऊपर चावल फेंके ।।

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा, भद्रम्पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभिः, व्यशेमहि देव हितं यदायुः ॥ २५.२१

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