यज्ञों के प्रकार

भारतीय परम्परा के अनुसार प्राणियों के ज्ञान, शक्ति, विद्या, बुद्धि, बल आदि की न्यूनाधिकता के कारण अधिकारानुरूप प्राणि-कल्याण के अनेक साधन बताये गये हैं । उनमें यज्ञ भी एक प्राणि-कल्याण का उत्कृष्ट साधन है । गीता-3/9 भगवान् ने सभी कार्यों को बन्धन स्वरूप बतलाया है परन्तु यज्ञ को- यज्ञार्थात् कर्मणो…न्यत्र लोको….यं कर्मबन्धनः॥ -गीता ३
कहकर बन्धन कारक नहीं बताया है । अतएव इसे बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले पावनानि मनीषिणाम् कार्यों में परिगणित किया है । वेदभाष्यकार आचार्य महीधर ने कार्यों के प्रशस्त, अप्रशस्त, श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम ये चार किये हैं । इनमें यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म बताया है । और इस अर्थ को श्रुति का समर्थन भी प्राप्त है ।

इस महत्त्वपूर्ण यज्ञ कार्य के भेद-उपभेदों की गणना करना साधारण कार्य नहीं है । गीता के चतुर्थाध्याय के यज्ञनिरूपण-प्रकरण में यज्ञ के 15 मुख्य भेद बतलाए गये हैं । यदि इनकी विभिन्न शाखाओं की गणना की जाय, तो यज्ञक्षेत्र को ‘अनन्त’ कह कर ही विश्राम करना पड़ेगा । अतएव हम इन भेदों की ओर न जाकर यज्ञकर्म के मुख्य शास्त्र ‘कल्प’ और उसके विद्वानों की परम्परा की ओर ही ध्यान देकर कुछ उपयोगी विचार उपस्थित करते हैं ।

महर्षि वेदव्यास की उत्कृष्ट रचना श्रीमद्भागवद भगवान् के श्रीमुख का यह वचन है-
वैदिकस्तान्त्रको मिश्र इति में त्रिविधोमखः॥ -11/27/7

इसके अनुसार सामान्यतः वैदिक, तान्त्रिक ओर मिश्र ये तीन यज्ञनुष्ठान की शैलियाँ ज्ञात होती हैं । यहाँ तान्त्रिक और मिश्र शब्द की व्याख्या में विचारकों के विभिन्न मत दिख पड़ते हैं । कुछ लोग तान्त्रिक शब्द से तन्त्र दर्शन प्रतिपादित योगादिक्रियाओं का, तथा कई विचारक दक्षिण और वाममार्ग नाम से प्रसिद्ध तन्त्रपद्धति के कार्यों का निर्देश बताते हैं । परन्तु यांत्रिक विचारकों के अनुसार-‘कर्मणां युगपद्भावस्तन्त्रम’- 1/7/1 इस कात्यायन महर्षि की परिभाषानुसार एक कार्य में ही विभिन्न शाखाओं में प्रतिपादित अनेकताओं का अविरोधी संकलन करना ‘तन्त्र’ शब्द का अर्थ है । ऐसे ही कार्यों को ‘तान्त्रिक’ शब्द से निर्दिष्ट किया गया है ।

इस अर्थ के मान लेने पर इस प्रकरण में ही आगे कहे गये भगवदर्चा सम्बन्धी सभी विधान सुसंगत हो जाते हैं और ऐसे ही तान्त्रिक कार्यों के लिए आजकल स्मार्त शब्द का व्यवहार प्रचलित है । शास्त्रकारों ने स्मार्त शब्द की जो व्याख्या की है, उससे भी अनेक शाखाओं तथा नेक वेदों के कार्यों का एक जगह सम्मिश्रण माना गया है । ‘मिश्र’ शब्द साधारण मिलाव का अर्थ रखता है । मिश्र शब्द से ऐसे कार्यों का संकेत है जिसमें वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण हो । याज्ञिक परम्परा के विचार से यहाँ मिश्र शब्द से पौराणिक कार्यों का संकेत है । उनकी दृष्टि में वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण ही पौराणिक विधान है ।
उक्त याज्ञिक विचार से मख अर्थात् यज्ञ की श्रौत (वैदिक) स्मार्त (तान्त्रिक) और पौराणिक (मिश्र) ये तीन मुख्य शैलियाँ हैं ।

श्रौतयज्ञ
श्रुति अर्थात् वेद के मंत्र और ब्राह्मण नाम के दो अंश हैं । इन दोनों में या दोनों में से किसी एक में सांगोपांग रीति से वर्णित यज्ञों को ‘श्रौतयज्ञ’ कहते हैं । श्रौत कल्प में ‘यज्ञ’ और ‘होम’ दो शब्द हैं । जिसमें खड़े होकर ‘वषट्’ शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है और याज्या पुरोनुवाक्या नाम के मंत्र पढ़े जाते हैं, वह कार्य ‘यज्ञ’ माना जाता है । जिसमें बैठकर ‘स्वाहा’ शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है यह होम कहा जाता है । श्रौतयज्ञ-इष्टियाग, पशुयाग और सोमयाग इन नामों से मुख्यतया तीन भागों में विभक्त है ।

श्रौतयज्ञों के विधान की एक स्वतंत्र परम्परा है, उस प्रयोग परम्परा का जिस कार्य में पूर्णतया उललेख हो उसे ‘प्रकृतियाग’ कहते हैं और जिस कार्य में विशेष बातों का उल्लेख और शेष बातें प्रकृतियोग से जानी जाएँ उसे ‘विकृतियाग’ कहते हैं अतएव श्रौतयज्ञों के तीन मुख्य भेदों में क्रमशः दर्शपूर्णमासेष्टि, अग्नीपोमीय पशुयाग, और ज्योतिष्टोम सोमयाग ये प्रकृतियाग हैं । अर्थात् इन कर्मों में किसी दूसरे कर्म से विधि का ग्रहण नहीं होता । इन प्रकृतियागों के जो धर्म ग्राही विकृतियाग हैं वे अनेक हैं । उनकी इयत्ता का संकलन भिन्न-भिन्न शाखाओं के श्रौतसूत्रों में किया गया है । यहाँ उनका बिना परिचय के नाम गिनाना अनुपयुक्त और अरोचक होगा । अतः श्रौत यज्ञ का सर्व सामान्य परिचय इस प्रकार समझना चाहिए ।

श्रौतयज्ञ- आह्वनीय, गार्ह्यपतय, दक्षिणाग्रि इन तीन अग्नियों में होते हैं इसलिए इन्हें ‘त्रेताग्नियज्ञ’ भी कहते हैं । प्रायः सभी श्रौत-यज्ञों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से, कम या अधिक रूप से तीनों ही वेदों के मंत्रों का उच्चारण होता है । अतः श्रौतयज्ञ ‘त्रयी’ साध्य हैं । इनमें यजमान स्वयं शरीर क्रिया में उतना व्यस्त नहीं रहता जितने अन्य ब्राह्मण जिन्हें ‘ऋत्विज्’ कहते हैं वे कार्य संलग्न रहते हैं । श्रौतयज्ञ का इष्टियाग प्रायः 4 वैदिक विधान कुशल ब्राह्मण विद्वानों के सहयोग से हो सकता है । पशुयाग में 6 ऋत्विज् होनो आवश्यक होता है । सोमयाग में 16 ऋत्विज् होते हैं ।

इष्टियाग में अन्नयम प्रधान रूप से हवि अर्थात् देवताओं के लिए देय द्रव्य हैं । पशुयाग में प्रधान रूप से ‘पशु’ हवि है । सोमयाग में प्रधान हवि सोम होती है । सोमयाग के महान् यज्ञ सत्र और अहीन नाम से कहलाते हैं । सत्रयाग होते हैं, और इन्हीं में से 16 व्यक्तियों को ‘ऋत्विज्’ का कार्य करना पड़ता है, इसमें दक्षिणा नहीं दी जाती है और यज्ञ का फल सब यजमानों को बराबर पूरा मिलता है । अहीनयाग में एक या अनेक अग्निहोत्री यजमान हो सकते हैं । परन्तु इसमें ‘ऋत्विज्’ अलग होते हैं, जिन्जें दक्षिणा दी जाती है । इस अहीनयाग का फल केवल यजमानों को ही मिलता है ।

इन श्रौतयज्ञों का प्रचार आजकल भारतवर्ष में नहीं के बराबर है, क्योंकि आजकल का मानव बहुमुखी और बहुधन्धी है । उसे कोई शास्त्रीय बंधन पसन्द नहीं है । श्रौतयाग करने का वही अधिकारी है, जिसने विधिपूर्वक श्रौत अग्नियों का आधार लिया है । और प्रतिदिन सांय प्रातः अग्निहोत्र में श्रद्धापूर्वक विधानुकूल समय लगता है । श्रौताग्रिहोत्री को अग्नि की निरन्तर रक्षा करनी पड़ती है । अग्नियों के रखने के लिये एक सुन्दर अग्निहोत्रशाला चाहिए । कुछ यज्ञों में दूध दही चाहिए वह बाजारू नहीं होनी चाहिये । अग्निहोत्री स्वयं गौ रखकर आवश्यकता होने पर मंत्रों द्वारा दूध दुहता है और मंत्रों से ही दही जमाता है । अतएव गो रक्षा करना भी आवश्यक है ।

प्रत्येक पन्द्रहवें दिन ‘प्रतिपद्’ तिथि को इष्टियाग करना आवश्यक है जिसमें हवनीय द्रव्य तथा ऋत्विजों की दक्षिणा आदि भी आवश्यक है । इन सब साधनों को कथंचित् सुलभ कर लेने पर भी सबसे मुख्य बात जो परम आवश्यक है और जिसका अत्यन्त अभाव है, वह है वेद की याज्ञिक परम्परा का प्रायोगिक पूर्णज्ञान । आज इसका लोप होता जा रहा है । जिस प्रकार आज हम वेद के उन अर्थों के सम्बन्ध में अनभिज्ञ हैं, जिनसे जल-स्थल-नभ सम्बंधी चमत्कारी वैज्ञानिक मंत्र क्रियाओं का ज्ञान हो सकता था, वैसे ही वर्तमान परिस्थिति, शिक्षा समाज एवं सरकार की उपेक्षा वृत्ति से 10-15 वर्ष के भीतर याज्ञिक प्रयोगपद्धति से भी सर्वथा अनभिज्ञ हो जायेंगे ऐसा प्रतीत होता है ।

स्मार्त यज्ञ
इनका श्रौत सूत्र कारों ने पाक यज्ञ तथा एकाग्नि शब्द से व्यवहार किया है । इनके मुख्यतया-हुत, अहुत, प्रहुत और प्राशित ये चार भेद हैं । जिन कार्यों में अग्नि में किसी विहित द्रव्य का हवन होता हो, वह हुत यज्ञ हैं । जिससे हवन न होता हो केवल किसी क्रिया का करना मात्र हो वह अहुत यज्ञ है । जिसमें हवन और देवताओं के उद्देश्य से द्रव्य का ‘बलि’ संज्ञा से त्याग हो, वह प्रहुत यज्ञ है । और जिसमें भोजन मात्र ही हो वह प्राशित यज्ञ है ।- प्रा.गृ.1/4/1

स्मार्त यज्ञ का आधार भूत अग्नि शास्त्रीय और लौकिक दोनों प्रकार का होता है । शास्त्रीय अर्थात् आधान विधि के द्वारा स्वीकृत अग्नि औपासन, आवसथ्य, गृह्य, स्मार्त आदि शब्दों से कहा जाता है । इस अग्नि में जिसने उसको स्वीकार किया है, उसके सम्बंध का ही हवन हो सकता है । साधारण अग्नि लौकिक अग्नि है । इसे संस्कारों द्वारा परिशाधित भूमि में स्थापित करके भी स्मार्त यज्ञ होते हैं । स्मार्त यज्ञों की संख्या श्रौत यज्ञों की भाँति अत्यधिक नहीं हैं । इन यज्ञों की विधि और इयत्ता बताने वाले ग्रन्थ को ‘गृह्यसूत्र’ या ‘स्मार्त सूत्र’ कहते हैं । पंचमहायज्ञ, षोडशसंस्कार और और्ध्वदैहिक (प्रचलित मृत्यु के बाद की क्रिया) प्रधानतया स्मार्त हैं । स्मृति ग्रन्थों में उपदिष्ट कार्य जिनका (विनायक शान्ति आदि का) पूर्ण विधान उपलब्ध गृह्यसूत्रों में नहीं मिलता है । वे भी याज्ञिकों की परम्परा में स्मार्त ही कहलाते हैं । स्मार्त यज्ञ में प्रायः अकेला भी व्यक्ति कार्य कर सकता है । हवन वाले कार्यों में एक ब्रह्मा की तथा भोजनादि में अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है । गृह्यसंग्रहकार ने स्मार्त यज्ञों में यजमान ब्रह्मा और आचार्य (नामभेद) इन तीन की आवश्यकता बताई है ।

इस समय शास्त्रीय अग्नि कार्य प्रायः लुप्त से हो गये हैं, क्योंकि इनमें भी अग्निरक्षा आदि का कार्य आजकल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं बैठ पाता । जिनमें लौकिक अग्नि का ग्रहण है वे संस्कार, उपाकर्म, अन्त्येष्टि, आदि प्रचलित हैं । पर वे भी इनी-गिनी संख्या में हैं । स्मार्त यज्ञों में मानव के नैतिक गुणों के विकास का फल अधिक है । आज इनका प्रचार-प्रसार कम हो गया है । संभवतः आज की बढ़ती हुई अनैतिकता में हमारे लिए यह भी एक कारण हो।

पौराणिक यज्ञ
श्रुति स्मृति कथित कार्यों के अधिकारी अनाधिकारी सभी व्यक्तियों के लिए पौराणिक कार्य उपयोगी है । आज कल इन्हीं का प्रचार और प्रसार है । पौराणिक कार्यों में यज्ञ शब्द का प्रयोग कल्प सूत्रकारों की याज्ञिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है । परन्तु गीता के व्यापक क्षेत्र से इनके लिए भी ‘यज्ञ’ शब्द का व्यवहार होता है । अतएव पौराणिक यज्ञों को हवन, दान, पुरश्चरण, शान्तिकर्म, पौष्टिक, इष्ट, पूर्त्त व्रत, सेवा, आदि के रूप से अनके श्रेणियों में विभक्त किया गया है । जिन जातियों को वेद के अध्ययन का अधिकार है, वे पौराणिक यज्ञों को वेदमंत्रों सहित करते हैं और जिन्हें वेद का अधिकार नहीं है, उनको पौराणिक मंत्रों से ही करते हैं । हमने भी सभी वर्गों की उपयोगिता की दृष्टि से इनकार यह निर्देश किया है ।

पौराणिक यज्ञों का विस्तार अधिक है, अतएव यहाँ इनका पृथक्-पृथक विवेचन करना संभव नहीं हो सकता । साधारणतया पौराणिक यज्ञों में गणपति पूजन, पुण्याहवाचन, षोडशमातृका पूजन, वसोर्धारा पूजन, नान्दी श्राद्ध इन पाँच स्मार्त अंगों के साथ ग्रहयाग प्रधानपूजन आदि विशेष रूप से होता है । इनमें एक से लेकर हजारों तक कार्यक्षम व्यक्ति कार्य के अनुसार ‘ऋत्विज्’ बनाए जा सकते हैं । पौराणिक यज्ञों के विस्तार में न जाकर यहाँ संक्षेप में श्रुति प्रतिपादित यज्ञों का परिचय दिया जा रहा हैं । यों तो यज्ञ के असंख्य भेद अर्थात् प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं । उन सबका केवल नामोल्लेख भी इस छोटे से लेख में नहीं किया जा सकता, तब उनके स्वरूप का वर्णन, उसके अनुष्ठान के प्रकार एवं अवान्तर अंग उपांग आदि का संक्षेपतः भी वर्णन यहाँ किस तरह किया जा सकता है । कई यज्ञ तो ऐसे हैं जिनके अनुष्ठान का न तो आज तक कोई योग्य अधिकारी ही है । न अनेक कारणों से उसका अनुष्ठान किया ही जा सकता है । जैसे भगवान् अनन्त, अपार हैं, वैसे ही उनके स्वरूप भूत वेद तथा तत्प्रतिपाद्य यज्ञ की महिमा भी अनन्त अपार है ।

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