यज्ञोपैथी

यज्ञ :  एक समग्र उपचार प्रक्रिया

यज्ञ चिकित्सा का पूर्ण शास्त्रोक्त विधान अज्ञात होते हुए भी कुछ साधारण प्रयोग अनुभव में ऐसे आते रहते हैं, जिनके द्वारा रोगनिवारक का कार्य साधारण दवा दारू की अपेक्षा अधिक सरलता पूर्वक हो सकता है।

रोगियों की शारीरिक स्थिति अलग प्रकार की होती है।

जिन्हें कई साधारण मन्द रोग होते हैं, उन्हें चलने- फिरने स्नान करने आदि साधारण कार्यो में कुछ कठिनाई नहीं होती वे हवन पर स्वयं बैठ सकते हैं। जिनको चलने- फिरने स्नान करने आदि में असुविधा है उन्हें आहुति आदि स्वयं तो नहीं देनी चाहिए पर हवन स्थान के निकट ही आराम के साथ बैठ जाना चाहिए। जो रोगी बिलकुल असमर्थ हैं उनकी रोग शैय्या के समीप ही हवन किया जा सकता है। वे रोगी हवन की ओर मुख किये हों ताकि हवन में होमी हुई आहुतियों की गन्ध उनके मुख और नासिका तक पहुँचती रहे। यदि वायु अथवा मौसम प्रतिकूल न हो तो रोगी के शरीर को जितना सम्भव हो उतना खुला रखकर या कम से कम व हलके- ढीले कपड़े पहनकर भी उस यज्ञ वायु को शरीर से स्पर्श करने का प्रयत्न करना चाहिए।

ऐसे हवन देवआह्वान के लिए नहीं, चिकित्सा प्रयोजन के लिए होते हैं, इसलिए इनको देव पूजन आदि की सर्वाङ्गपूर्ण प्रकियायें न बन पड़ें तो चिन्ता की बात नहीं है।

ताँबे के हवन कुण्ड में अथवा भूमि पर १२ अँगुल चौड़ी १२ अँगुल लम्बी, ३अँगुल ऊँची, पीली मिट्टी या बालू की वेदी बना लेनी चाहिए। हवन करने वाले उसके आस- पास बैठें। यदि रोगी भी हवन पर बैठ सकता हो तो उसे पूर्व की ओर मुख कराके बिठाना चाहिए। शरीर- शुद्धि, मार्जन,शिखाबन्धन, आचमन, प्राणायाम, न्यास आदि गायत्री मन्त्र से करके कोई ईश्वर प्रार्थना हिन्दी या संस्कृत की करनी चाहिए। वेदी और यज्ञ का जल, अक्षत आदि से पूजन करके गायत्री मन्त्र के साथ हवन आरम्भ कर देना चाहिए।

यदि कोई जानकार यज्ञकर्ता हो तो उन पद्धतियों में से जितना अधिक सम्भव हो विधि- विधान से प्रयोग करले।

यदि रोगी के निकटवर्ती लोगों को उतनी जानकारी न हो तो

एक लोटे में तथा कटोरी में रख कर हवन सामग्री से आहुतियाँ देनी आरम्भ कर देनी चाहिए।
जिन रोगों में रोगी को लंघन हो रहे हों, उन में तिल, जौ तथा चावल स्वल्प मात्रा में ही डालना चाहिए।

ऐसी स्थिति में जो घी हवन सामग्री में मिलाया गया है उतना ही पर्याप्त है। यदि रोगी खाता- पीता है तो हवन सामग्री में मिलाकर अथवा अलग से आहुति देकर घी का समुचित उपयोग किया जाना ठीक है। कुछ ओषधियाँ, सामग्री प्रत्येक रोग में प्रयुक्त होती हैं। उनके साथ- साथ उस विशेष रोग में उपयुक्त विशेष ओषधियाँ पुरानी, सड़ी, घुनी, हीनवीर्य न हों जितनी ताजी और अच्छी हवन ओषधियाँ होंगी उतना ही वे अधिक लाभ करेंगी। कम से कम २४ आहुतियाँ अवश्य देनी चाहिए। आवश्यकतानुसार पीछे भी दिन में तीन बार और रात को एक दो बार किसी पात्र में अग्रि रखकर थोंड़ी देर के लिए रोगी के निकट धूप की भाँति जलाई जा सकती हैं।

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