यज्ञ भारतीय दर्शन का ईष्ट आराध्य

अध्यात्म विज्ञान के तत्व दर्शन एवं क्रिया प्रयोजन के दोनों ही पक्ष यज्ञ विधा से सम्बन्धित हैं । कठोपनिषद् में यम नचिकेता सम्वाद में जिन पंच प्राणाग्नियों का विवेचन हुआ है वे अग्निहोत्र में सर्वथा भिन्न प्राण परिष्कार की चिन्तनपरक दिशा धाराएँ हैं । मीमांसा, सूत्र-गंथ ब्राह्मण एवं आरण्यकों में ‘यज्ञ’ शब्द यजन कृत्य के साथ सम्बद्ध है ।
जीवन यज्ञ का तात्पर्य है चिन्तन और चरित्र को पवित्र एवं प्रखर बनाना । अग्निहोत्रों का तात्पर्य ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करना है जो न केवल शरीर को ओजस्, मन को तेजस, आत्मा को वर्चस् दे सके वरन् इस प्रकृति ब्रह्माण्ड में भी अनुकूलताओं का अनुपात बढ़ा सके ।

यज्ञ में अग्नि का प्रयोग होता है इस परम्परा में शास्त्रकारों ने यह स्पष्ट किया है कि इस ब्रह्माण्ड में अग्नि के अनेक स्वरूप है । वे सभी अपने-अपने प्रयोजन के लिए समर्थ शक्तिवान हैं । किन्तु ‘यज्ञाग्नि’ उनमें विशिष्ट है । वह ज्वलनशील होते हुए भी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न होती है और देव संज्ञा में गिनी जाती हैं । यजन पूजन उसी का होता है और वही याजक की पवित्रता प्रखरता का सम्वर्धन करती हुई अभीष्ट सत्परिणाम प्रदान करती है ।

अग्नि देव का भारतीय देव मण्डल के प्राचीनतम सदस्य के रूप में वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों से महत्त्वपूर्ण स्थान है । ऋग्वेद का प्रथम मंत्र एवं शब्द अग्निदेव की स्तुति से ही आरंभ होता है । यह अग्नि ही यज्ञ का मुख्य अग्रणी, पुरोहित एवं संचालक है । क्योंकि उसी से विश्व ब्रह्माण्ड में रूप हैं, दर्शन है और प्रकाश है । उसी के आलोक से समस्त विश्व आलोकित है । उसी ज्ञान स्वरूप प्रकाशक, चेतना शक्ति की शासिका एवं अधिष्ठात्री अग्नि की अभ्यर्थना, उपासना से जीवन बनता, आत्मोन्नति होती और अमृतत्व की प्राप्ति होती है ।

देवताओं में सर्व प्रथम एवं सर्व समर्थ अग्निदेव की उत्पत्ति हुई । इसके गीता से वेद-पुराणों तक में कितने ही प्रमाण मिलते हैं ।महाभारत अश्वमेधिक पर्व, 92 वें अध्याय में उल्लेख है-

ब्रह्मात्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते ।
सृष्टाऽग्र्नमुखततः पूर्व लोकानां हितकाम्यया॥

अर्थात् श्री भगवान ने कहा-महातेजस्वी राजन्! मैंने सबसे पहले ब्रह्मस्वरूप से लोकों को बनाया । लोगों की भलाई के लिए मुख से सबसे पहले अग्नि को प्रकट किया । इसी अध्याय के वैष्णव पर्व में कहा गया है-सभी भूतो से पहले अग्नि तत्व मेरे द्वारा पैदा किया गया, पुराण ज्ञाता मनीषी उसे ‘अग्नि’ कहते हैं । अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप जाने जाते हैं- (1)व्योम में सूर्य (2)अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत (3)पृथ्वी पर साधारण अग्नि रूप ।
ऋग्वेद में सबसे अधिक सूक्त अग्नि की स्तुति में ही अर्पित् किये गये हैं । अग्नि के आदिम रूप संसार के प्रायः सभी धर्मों में पाए जाते हैं । वह ‘गृहपति’ हैं और परिवार के सभी सदस्यों से उसका स्नेहपूर्ण घनिष्ठ सम्बंध है
(ऋ. 2.1.9.7.15.12. और 1.1.9.4.1.9.) वह अन्धकार निशाचन, जादू-टोना, राक्षस और रोगों को दूर करने वाला है ऋ. 3.5.11149.5.8.43.32. 10.88.22. ।

अग्नि का यज्ञीय स्वरूप मानव सभ्यता के विकास का लम्बा चरण है । परिपाक और शक्ति- निर्माण की कल्पना इसमें निहित है । यज्ञीय अग्नि वेदिका में निवास करती है(ऋ. 11. 140. 1) वह समिधा, सोम और घृत से शक्तिमान होता है । (ऋ. 3. 55.10. 1. 94. 14), वह मानवों और देवों की बीच मध्यस्थ और सन्देश वाहक है । (ऋ. 1. 26. 9. 943.1.593,
1.59.1,7.2.1,1.58.1,7.2.5,1.27.4.3.1.17.10.2.1.1.14.आदि) ।
अग्नि की दिव्य उत्पत्ति का वर्णन भी वेदों में विस्तार से पाया जाता है । (ऋ. 3. 9.5.6.8.4.) । वह देवताओं का पौराहित्य करता है ।
वह यज्ञों का राजा है राजा त्वमध्यवराणाम् ऋ.वे . 3. 11. 18.7.11.4.2.8.43.24.आदि ।

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